नवाबों के शहर लखनऊ की दुर्दशा देखी नहीं जाती
June 19, 2019 • UPMA SHUKLA

दोस्तों आप यकीन नहीं करेंगे जिस लखनऊ शहर में लोग नवाबी माहौल में मस्ती लिया करते थे आशीष शहर में 50 साल बाद जो जनसंख्या हो गई है वह शासन-प्रशासन के संभाले नहीं संभल रही है एक समय था यहां रिक्शे तांगे सवारी नहीं पाते थे चौक अमीनाबाद हजरतगंज में वही लोग दिखते थे जो एक दूसरे को जानते थे अंधेरा होने से पहले लोग घर चले जाते थे क्योंकि रास्ते में लूट ले लिए जाएं उसी लखनऊ में आज सड़कें गाड़ियों से पटी हुई है जगह-जगह जाम है इतना प्रदूषण है की बीमारियों की भरमार हो गई है जहां पांच लाख आबादी हम लोगों ने के समय में थी आज वहां की आबादी शहरी क्षेत्र में 5000000 और उससे बाहर जाइए तो एक करोड़ के करीब हो जाएगी 25 30 लाख वाहन लगभग पूरा शहर लखनऊ कंक्रीट की छतों से पट गया है पेड़ पौधे अब देखते नहीं है इस लखनऊ शहर को बागों का शहर कहा जाता था सूरज डूबते ही चौक जैसे क्षेत्रों में रंगीली अच्छा जाती थी नवाबों की बगिया कोठों पर बजने वाली हारमोनियम और सारंगी ओं के बीच में एक वह रौनक दिखाती थी जो आज भी याद कर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं अजीब सी सिहरन पैदा होती है शहर क्या जी लखनऊ जो 24 घंटे भीड़ भीड़ भीड़ में फस गया है आदमी आदमी के ऊपर हावी होता जा रहा है यह है क्या या तो सिर्फ ऐसा लगता है कि पिछले 70 साल में गांव देहातों मैं बिजली की कमी रोजगार की कमी सबको लखनऊ खींच लाई है जबकि लखनऊ में है क्या कोई कारखाना नहीं कोई नौकरी नहीं सचिवालय फूल सरकारी नौकरियां फूल यहां बचा क्या है बस स्कूल कॉलेज जहां देहातों से गांव से दूर दराज से बच्चे आकर पढ़ाई कर रहे हैं अपने अभिभावकों का पैसा बर्बाद कर रहे हैं ना यहां कोई नौकरी है ना यहां कोई फैक्ट्री है नई सरकार ने पिछले 70 साल में स्कूटर इंडिया और टेल्को के अलावा कोई कारखाना लगाया जिससे कम से कम लखनऊ के लोग का काम पाए जाते हैं यहां तो हर आउटर रोड पर सिर्फ और सिर्फ इंजीनियरिंग कॉलेज लॉ कॉलेज कॉलेज कॉलेज दिखाई देते हैं और बाहर गांव देहात से लोग अपना घर घाट बेचकर लखनऊ में आकर जमीन लेकर बस से जा रहे हैं ना यहां कोई काम है मैं यहां कोई नौकरी है बस यहां बिजली है 24 घंटे बिजली है थोड़ा बहुत मौज मस्ती की जगह बन गई है उसकी लालच में लोग अपनी खेती बारी बेचकर यहां आते जा रहे हैं और आते जा रहे हैं मामला लखन एक करोड़ के करीब पहुंच गया है इतनी भीड़ संभाले नहीं संभल रही है आगे क्या होगा जहां रोजगार नहीं है वहां इन पढ़ने वाले बच्चों को कौन संभालेगा हालत हो रही है यहां आकर हॉस्टलों में घरों में रहकर पढ़ने वाले निरंतर बिगड़ते जा रहे हैं हालत यह हो रही है आर्थिक अपराध की संख्या बढ़ती जा रही है ठगी ज्यादा हो रही है बस यहां लोग एक दूसरे को टोपा पहना रहे हैं किसी के पास कोई काम नहीं है अब यहां की नवाबी तो खत्म हो गई अब तो सिर्फ बर्बादी के दिन देख रहे हैं देखिए अब लखनऊ में होता क्या है यहां की बोली भाषा पूरी दुनिया में पसंद की जाती थी आजा के लोगों को बोलो बड़ी नफरत की निगाह से देखते हैं क्या हो गया है लखनऊ को खाली और खाली सिर्फ खाली दिखावटी बंगले बिल्डिंग के बन गई है अवैध धंधों का वाईआर हो गया है अपराधियों के अड्डे बन गए किसी के संभाले यातायात तक नहीं संभल रहा सड़के छोटी है बिना विस्तृत योजना के लखनऊ वस्था जा रहा है ऐसी हालत में कल क्या होगा इस नवाबों के शहर में जहां की शाम कितनी रंगीन हुआ करती थी वह हम लोगों ने देखी है आज कितनी संगीन हो गई है हम लोग आज बुढ़ापे में देख रहे हैं अगर समय रहते यहां कारखाने या लोगों को नौकरी के साधना उपलब्ध कराए गए तो लखनऊ की महामारी बहुत भारी पड़ेगी आफत सामने खड़ी है बचाने वाला कोई नहीं है कहते हैं यह तो लखनऊ ऊपर वाले के सहारे हैं पूरा प्रदेश यहां पान पड़ा है देश यहां पान पड़ा है कारण सिर्फ इतना है लखनऊ की तहजीब यहां के लोग बहुत अच्छे रहे यहां आज भी बहुत शांति है मुंबई में भीड़ पैसा चाहिए दिल्ली में सुरक्षा परेशान हो गए सबसे सुंदर है शहर अगर इसके बाद बचता है तो वह है लखनऊ सबा के यहां आकर बस गए हैं या बसना चाहते हैं क्योंकि आज शांति है आतंकवाद नहीं है यहां किसी तरह की हिंसा नहीं है लेकिन यह सब कब तक एक सवाल है नवाबों का यह शांतिपूर्ण शहर किस रास्ते पर जा रहा है यहां बस एक ही यही सवाल उठ रहा है यह सब कब तक चलेगा आपका आरडी शुक्ला