भाई की मौत जेल और फिर पीएसी विद्रोह का खौफ
March 15, 2019 • UPMA SHUKLA

यह बात मैं आपको 1973 केपीएससी विद्रोह की आंखों देखी सुना रहा हूं मैं आरडी शुक्ला उस समय बीकॉम की पढ़ाई कर रहा था और लखनऊ विश्वविद्यालय का छात्र नेता भी था उस समय हमारे छात्र संघ के अध्यक्ष स्वर्गीय रविंद्र सिंह थे उस समय उनके नेतृत्व में प्रदेशभर में जबरदस्त छात्र आंदोलन चल रहा था लखनऊ विश्वविद्यालय धू धू कर जल रहा था पूरे प्रदेश की अधिकांश पीएससी यहां विश्वविद्यालय में भर दी गई थी प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी मुख्यमंत्री थे हम छोटे बड़े सभी छात्र नेता के विरुद्ध पुलिस छापेमारी कर रही थी गिरफ्तारी के लिए छात्र नेता रोज स्वयं गिरफ्तारियां भी दे रहे थे छात्र पहले सभा करते थे और उसके बाद गिरफ्तारियां देते थे 8 मई 1973 को गिरफ्तारी देने की बारी मेरी थी मेरा एक बड़ा भाई विष्णु दत्त शुक्ला जो मुझ से 1 वर्ष बड़ा था कानपुर में 1 सप्ताह से बैंक में काम करने जाता था 8 मई की प्रातः उससे मेरी बात हुई उसने कहा मैं जा रहा हूं कानपुर बैंक दो-तीन दिन जाना है वह आता हूं मैंने कहा मुझे आज विश्वविद्यालय में गिरफ्तारी देनी है मैं वहां जा रहा हूं दोनों गले मिले और वह अपने काम से चला गया धीरे-धीरे मैं तैयार होकर अपने काम में लग गया और छुपता छुपाता विश्वविद्यालय पहुंच गया वहां कॉमर्स फैकेल्टी पर एक मंच सा बना था वहां माइक लगा था और वहां हम लोगों की सभा हो रही थी सभा के बाद जुलूस निकलना था और हम लोगों को गिरफ्तारी देनी थी इसी बीच हमारे एक मित्र प्रसिद्ध गिटार वादक था और विश्वविद्यालय का छात्र उसके पिताजी लखनऊ में सिटी मजिस्ट्रेट उसका नाम नवीन फिलिप्स है वह अचानक पहुंचा मंच पर उसको देखकर मुझे आश्चर्य हुआ की यह संगीतकार सीधा साधा लड़का ही नेतागिरी में कहां से आ गया उसने मुझे बुलाया और कहा चलो घर चलना है मैंने घर जाना है मैं तो गिरफ्तारी देने आया हूं बहुत जरूरी काम है मैं नहीं समझा बहुत समझाने पर उसके नीचे आया मंच के मुझे अभी जो काम हो बाद में कर दूंगा नहीं माना और मुझे नीचे ले जा कर बैठा महानगर घर के पास पहुंचा तो बोला देखो अपना पक्का कर लो तुम्हारा भाई विष्णु दत्त कानपुर में सिग्नल की टक्कर से घायल होकर मर गया है मैं घर पहुंचा तो वहां स्वर्गीय डीपी बोरा जी कानपुर से हमारे भाई की लास्को ला चुके थे मैं यह सब देखकर अवाक रह गया चंद घंटों में यह क्या हो गया मेरा घर परेशान था लेकिन मैं कर क्या सकता था किसी तरह सब ने समझाया घर को हमने समझाया पूरे घर को बहुत बड़ी चोट पहुंची थी दूसरे दिन 9 तारीख को भी हमारे यहां घर में खूब भीड़ लगी रही समझाने वाले लोग आते रहे क्योंकि मेरा भाई बहुत ही लोकप्रिय था बहुत ही ज्यादा सामाजिक था उसे लोग बहुत बहुत चाहते थे उसे बहुत प्यार करते थे 10 मई को मेरी परीक्षा थी विश्वविद्यालय स्वर्गीय डीपी बोरा जी ने मुझसे कहा तुम परीक्षा दे आओ मैं तुम्हें विश्वविद्यालय छोड़ देता हूं मैंने कहा मुझे वहां गिरफ्तार कर लेंगे मैं परीक्षा नहीं दूंगा लेकिन वह नहीं माने मुझे विश्वविद्यालय छुड़ाए मैंने परीक्षा दी तब तक मेरे पीछे पुलिस और सीआईडी वाले लग गए थे और परीक्षा देकर निकलते ही हम को गिरफ्तार करके सीधे कैंट थाने ले गए जहां से मुझे मॉडल जेल भेज दिया गया बोरा जी ने बहुत कोशिश की लेकिन पुलिस ने हम को नहीं छोड़ा घर में जेल चला गया मॉडल मॉडल जेल में रखा गया 2 दिन पहले भाई की मौत ऑफिस जेल वह भी हमारे साथियों से अलग रखा गया था मुझको बाकी साथी जिला जेल में थे किसी तरह मैं वहां अपने दिन काटने लगा प्रशासन ने हम लोगों को दो तीन हिस्सों में बांट रखा था एक साथ नहीं रहने दे रहे थे 20 मई क्या दिन था जिस दिन मेरी परीक्षा थी उस समय जेल में परीक्षाएं हम लोगों की हो जाया करती है विश्वविद्यालय से जीप आती थी उसमें एक अध्यापक पर्चा कॉपी सब आता था और हम लोग जेल में बैठकर परीक्षा देते थे लेकिन 20 तारीख को काफी देर हो गई लेकिन जीत नहीं आई इसी बीच हमारे पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष स्वर्गीय इंद्रदेव सिंह जी सीखते हुए आए और भोले पुरी में गोली चल रही है पीएसी ने विद्रोह कर दिया है छात्रों की एक हो गए हैं हनुमान सेतु पर सेना खड़ी है चार और गोली चल रही है आग लगी हुई है छात्र और पैसे वाले हो गए हैं मामा भांजे जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं हम लोग एकदम आश्चर्यचकित हो गए तो उन्होंने कहा बीबीसी रेडियो से सुन लो खबर हिंदुस्तान में तो नहीं दी जा रही है लेकिन बीबीसी से सुन लो यह खबर हम रेडियो का इंतजाम करके जेल की खबर सुनी जो सच धीरे धीरे मॉडल जेल में हम लोग एक किनारे किए जाने लगे इसी बीच जेल में पीएसी वाले जो घायल भी से स्टेशन पर वह जाने लगे और उनको हम लोगों की जगह पर बंद किया जाने लगा हम लोगों ने मौका मिलते ही उन लोगों के घरों और उन लोगों की सेवा शुरू कर दी क्योंकि उस समय सिविल पुलिस और जेल के बॉर्डर सब न्यूट्रल थे और घबराए हुए थे इसलिए हम लोगों को उनकी सेवा में कोई परेशानी नहीं हुई काफी लोगों के हम लोगों ने घाव पर मरहम लगाए सेवा की इसी बीच सायंकाल हो गई और हम लोगों से कहा गया कि अपना अपना सामान लेकर स्वयं जिला जेल चले जाएं यह पहला मौका था जो बिना किसी सुरक्षा के हम सभी छात्रों को जिला जेल भेज दिया गया और हम लोग खेलते हुए बिना किसी फोर्स के जिला जेल पहुंच गए जहां पर पहले से 2 दर्जन छात्र अध्यक्ष रविंद्र सिंह जी के नेतृत्व में वहां पहले से बंद थे फिर क्या था वहां हम लोगों ने इस पूरे मामले की जानकारी ली कि आखिर यह हो क्या रहा है प्रदेश भर में पीएसी गोली चला रही है सेना से युद्ध हो रहा है तो पता चला लखनऊ विश्वविद्यालय क्षेत्र हसनगंज आता है और वहां के क्षेत्राधिकारी ईनाम ली उन्होंने कुछ लोग जो पुलिस परिषद बना रहे थे अपनी मांगों को लेकर पीएसी में काम करते थे जिसमें से राम आशीष राय प्रमुख अन्य नहीं रहा है छात्र नेताओं में सीबी सिंह भगवती सिंह इन सब को वह वार्ता करने के लिए मैं नाली लेकर चले गए वहां के जंगल में उन्होंने इन लोगों को तीन-चार दिन प्रताड़ित कर यही सिर्फ कहा कि सब काम छोड़ दो वरना ठीक नहीं होगा यह लोग किसी तरह मौका पाकर वहां से भाग निकले अब चौकी यूपी भर की पूरी पीएसी लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन के सिलसिले में पड़ी हुई थी वह सीधे वहां से भागकर यहां आए और उन्होंने अपने पी एस सी वालों को वहां पुलिस अधिकारियों द्वारा की गई प्रसारण बताइए जिस पर उबाल आ गया तुरंत पी एस सी वालों ने रात में ही योजना बनाई जिन छात्रों के लिए उनकी ड्यूटी लगी थी उनको उन्होंने मिला लिया आपस में और मामा भांजे एकता जिंदाबाद के नारे लगने लगे पीएसी वालों ने अपनी गाड़ियों से डीजल निकाल निकाल कर छात्रों को देना शुरू किया और आगजनी शुरू हो गई यह सब देख कर शासन में हनुमान सेतु पर सेना तैनात की लेकिन सेना ने अपनी पोस्ट पर सीधे गोली चलाने से साफ मना कर दिया सूत्र बताते हैं कि यह खबर जब 35 बटालियन महानगर रामनगर और यूपी के जितने भी पीएसी बटालियन से जब पहुंची तो वहां गोलाबारी शुरु हो गई दूसरी ओर सेना ने पीएसी के शास्त्रों को अपने कब्जे में लेने के लिए कार्रवाई शुरू की 2 दिन तक यह कार्रवाई चलती रही काफी लोग हताहत भी हुए अब इसका तो पूरा है वास्तविक रिकॉर्ड नहीं मालूम हो कि हम लोग जेल में थे लेकिन हां काफी लोग घायल हुए काफी लोग मारे गए तीसरे चौथे दिन इंदिरा गांधी ने कमलापति त्रिपाठी को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया तत्काल पी एस सी वालों की मांगें मानी गई उनके भत्ते बढ़ाए गए लगभग जो चाहते थे वह सभी बातें मान ली गई ऐसी वालों ने भी संयम से काम किया और किसी परिषद यूनियन पर ज्यादा जोर नहीं दिया मामला तो शांत हो गया लेकिन जितने भी नेता थे उन सब को बर्खास्त कर दिया गया और वह आज भी नौकरी से बाहर हैं लेकिन उनकी कुर्बानी की वजह से आज जो तेरी काट के वर्दी पुलिस पहन के घूम रही है और जो भत्ते मिल रहे हैं वह हमेशा उनके नेतृत्व को बल देता रहेगा उन लोगों को भी इस बात का गम नहीं है कि उनकी नौकरी चली गई लेकिन उन्होंने जो पुलिस बल को ताकत दे दी और जो एक झटके में है सरकार को इतना बड़ा खोफ दे दिया क्यों आज तक 1973 के विद्रोह के खौफ से घबराती है उसी समय की पुलिस के लिए की गई हम लोगों की सेवा आज तक उनको याद है पत्रकारिता के नाते पुलिस से हमारे संबंध नहीं है हमारे संबंध उस जेल के संबंध है सबको घायल होकर के मॉडल जेल में आ रहे थे और हम उन लड़के उनकी सेवा कर रहे थे आज ही उनका अनाधिकृत नेतृत्व हम लोगों को बहुत मानता है आज भी पुलिस पीएसी कि हम लोग जो करते हैं और वह हम लोगों के लिए सब कुछ करते हैं इसका मतलब यह नहीं लेकिन उस समय जो हुआ उससे आज तक हम लोगों को जो पुलिस बल से मिलता है वह पत्रकारिता से नहीं मिलता है वह सिर्फ उस समय हम लोगों ने मिलकर जो संघर्ष किया उसकी वजह से मिलता है आज तक यूपी पुलिस और पीएसी की जो हम लोग जो करते हैं उसका कारण भी यही है कि हमने देखा है किस तरह पीएसी का खून बहा और क्या हालत हम लोगों ने उनके घायल अवस्था में जो सेवा की वहीं आज उनका प्यार है हमको मिलता है जय हो यूपी पुलिस और पीएसी