लखनऊ अपराध और अपराधियों के घेरे में आर डी शुक्ला द्वारा भाग 1
August 27, 2019 • UPMA SHUKLA

दोस्तों मुझे जहां तक याद है मैं वहां तक आपको लखनऊ का अपराधिक इतिहास बताना शुरू करने जा रहा हूं उसकी यह पहली कड़ी है सन 1950 से 1960 तक के बीच लखनऊ की आबादी लगभग 500000 और 1000000 के बीच में रही होगी हर व्यक्ति एक दूसरे को जानता था पहचानता था मोहल्लों के नाम पर हजरतगंज नंबर 1 अमीनाबाद चारबाग पुराने लखनऊ का नखास डालीगंज अलीगंज निशातगंज हुसैनगंज लाल कुआं चौक राजा बाजार अय्या गंज और जितने भी छोटे-छोटे मोहल्ले से वह सब इन्हीं के इर्द-गिर्द थे उस समय एक तो बदमाशी होती ही नहीं थे केवल लखनऊ में रंगबाजी होती थी उस रंगबाजी में शहर शामिल रहता था उस समय ना चाकू का छोरा मकराना पिस्तौल इन सब खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल नहीं हुआ करता था केवल मूछों की रंगबाजी होती थी अखाड़े हुआ करते थे और पहलवान रंगबाजी करते थे उनसे पूरा शहर डरता था वहीं मुखिया हुआ करते थे हर मसले का हल वही अपने अखाड़ों में बुलाकर लोगों के किया करते थे उनकी सब मानते थे किसी तरह की कोई खून खराबे की कहानी नहीं सुनाई देती थी पुलिस थाने भी बहुत सीमित थे वैसे पुलिस की ज्यादा जरूरत ही नहीं होती थी जहां तक मुझे ध्यान है इस सबसे बड़ा अखाड़ा लखनऊ का अमीनाबाद फतेहगंज में लक्ष्मी नारायण पहलवान का हुआ करता था और उसके बाद दूसरा एक अखाड़ा मोहर्रम अली का रकाबगंज के पास होता था मुस्लिम समुदाय के लोगों का विश्वास मोहर्रम अली है पर था वह पहलवान थे और यह वह अपने समाज की समस्याओं का निपटारा अपनी रंगबाजी के बल पर किया करते थे लक्ष्मीनारायण जी का अखाड़ा फतेहगंज में काफी नामी था शहर भर के गंभीर मामले लक्ष्मी नारायण जी निपटाया करते थे किसी भी समस्या के निपटारे के लिए वह दोनों पार्टियों को अपने अखाड़े में बुला लिया करते थे और वहीं पर बिना किसी खून खराबे के बातचीत से मामले निपट जाया करते थे आज की तरह उस समय जमीन जायद दाद और आपस के झगड़े बहुत ज्यादा नहीं होते थे और जो होते थे उनको बड़ी सहूलियत से बिना अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग किए बगैर लक्ष्मीनारायण जी निपटा लिया करते थे उस समय लखनऊ के एकमात्र रंगबाज वही हुआ करते थे उनका मान सम्मान था उनकी पर्सनालिटी देखने वाली थी जो आज के जिम जाने वालों की नहीं होगी वह बॉडी उनकी हुआ करती थी दूसरी ओर पहलवान मोहर्रम अली भाई रकाबगंज से लेकर पुराने लखनऊ तक जलवा बनाए हुए थे खूब रंगबाजी थी उनकी वह अपने बिरादरी में होने वाले झगड़ा झंझट ओं को आपस में बैठा कर निपटा दिया करते हैं उनकी भी बॉडी देखने वाली थी पहलवान थे वह भी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नहीं करते थे नहीं किसी को प्रताड़ित करते थे सब उनकी इज्जत करते थे लक्ष्मी नारायण अमीनाबाद मैं बैठकर पूरे क्षेत्र को या यूं कहें पूरे लखनऊ रंगबाजी करते थे कहने को तो पहलवान थे लेकिन बड़े बड़े मामले वह बैठकर ही निपटा दिया करते थे उनका समय निर्धारित था सुबह शाम अखाड़े पर लोग पहुंच जाते थे वही नशा के निपटारे हो जाते हैं फतेहगंज से अमीनाबाद तक उनका आवागमन हुआ करता था बहुत नाम था रखा हूं मैं बहुत रंगबाजी लेकिन कोई अस्त्र लेकर नहीं चलते थे सुबह अखाड़े में कुश्ती लड़ना मुकदर चलाना उनका नित्य प्रति का काम था कोई मुकदमा भी उन पर नहीं चल रहा था ना ही उन्होंने कोई हत्या या कोई बड़ा अपराध किया था बस वे थे और उनके साथ चलने वाले चेले पूरे लखनऊ के मामले ऐसे हल हो जाते थे लगता ही नहीं था कि पुलिस थाना कचहरी की जरूरत है उन दिनों में मुकदमा थाने पर लोग जाते भी नहीं थे ठीक दूसरी तरफ मोहर्रम अली पहलवान रकाबगंज में बैठकर पूरे पुराने लखनऊ के मशीनों को हल किया करते थे हां उन लोगों की सन 1965 तक रंगबाजी जोरों पर रहा करती रही उसके बाद 65 से 70 तक धीरे धीरे लखनऊ में छोटे-छोटे अपराधी चाकू वाले पनपने लगे और कुछ कुछ लोग अस्त्र भी रखने लगे लेकिन खुलेआम उनका ना तो प्रदर्शन होता था और ना ही इस्तेमाल धीरे धीरे सन 70 आने तक लखनऊ का अपराधिक रूप बड़ी तेजी से बदलने लगा चलिए इस पहलवानी युग के बाद की कहानी हम आपको अगली कड़ी में सुनाएंगे जारी