लखनऊ अपराध और अपराधियों के घेरे में भाग दो आर डी शुक्ला द्वारा
August 30, 2019 • UPMA SHUKLA

लखनऊ में पहलवानी रंगबाजी लक्ष्मी नारायण के बेटे घनश्याम के बाद समाप्त हो गई इसके बाद शुरू हुआ 1965 के बाद का खतरनाक रंगबाजी का समय गोली बारूद का इस्तेमाल उस समय भी नहीं होता था लखनऊ में केवल साइकिल की चैन खेलने वाली हा की नि किल डस्टर और ज्यादा से ज्यादा चाकू रखकर लोग रंगबाजी किया करते थे सबके अपने अपने क्षेत्र थे छोटे-छोटे गुटों में बस एक दूसरे पर लाठी-डंडों से हमला हुआ करते थे ठीक इसी बीच में 1966 में लखनऊ विश्वविद्यालय और संबंध विद्यालयों जिसमें केकेसी डीएवी कॉलेज क्रिश्चियन कॉलेज नेशनल कॉलेज सब आपस में एक हो गए और वह हुए भी कैसे डीपी बोरा जैसा लखनऊ विश्वविद्यालय का अध्यक्ष हो गया जिसने सबको जोड़कर आपस में मिलाकर एक इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया छात्रों का जिसने प्रदेश को हिला के रख दिया उससे पहले भी आंदोलन होते रहे लेकिन इतना विकराल रूप और छात्र एकता का रूप जो 1966 में डीपी बोरा के अध्यक्ष बनने के बाद यूपी में दिखा वह आजादी के बाद पहला था जिसमें एकमात्र छात्र नेता और लखनऊ विश्वविद्यालय का अध्यक्ष पूरे उत्तर प्रदेश के छात्रों का अगुआ बन गया यही नहीं राज्य कर्मचारियों के साथ मिलकर बोरा जी ने एक नए तरह के आंदोलन की शुरुआत कर दी कर्मचारियों के नेता थे पशुपति नाथ शुक्ला छात्रों के नेता बने डीपी बोरा एक लंबा आंदोलन चला कर्मचारी छात्र एकता जिंदाबाद आजादी के बाद यह सबसे बड़ा आंदोलन था मैं तो समय हाई स्कूल में था लेकिन विश्वविद्यालय तक घूम आता था वहीं से लखनऊ की रंगबाजी में या यूं कहिए कि बदमाशी में एक नया मोड़ आ गया लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों कब वर्चस्व हो गया और बिना विश्वविद्यालय के छात्रों के समर्थन के लखनऊ में कोई भी बदमाश जी नहीं सकता था उस समय 66 से और 70 के बीच में फुट कर में दादा होने लगे जैसे चारबाग जोकि रेलवे स्टेशन था ट्रांसपोर्ट का काम होता था वहां ठीक-ठाक उगाही होती थी वहां तो वहां पर कुछ लोगों जैसे भंडारी बक्शी रूद्र जैसे कुछ नाम सुनाई पड़ने लगे इसी तरह डालीगंज क्षेत्र में गल्ला मंडी हुआ करती थी गल्ला व्यापारियों से भी उगाही होती थी पैसा मिलता था तो यहां भी कुछ नाम उभर कर आने लगे प्रेम शंकर शुक्ला राम गोपाल मिश्रा यह प्रमुख थे सब साथ में ही काम करते थे कोई युद्ध नहीं होता क्या इसी तरीके से निशातगंज में दया शीतला होते इनकी रंगबाजी चलती इसी तरीके से जिया मऊ क्षेत्र में सुखदेव का नाम था यह सब के खलीफा थे देहात क्षेत्र का नेतृत्व मावशी के रामचंद्र यादव करते थे शिवकुमार करते थे निगोहा मोहनलालगंज गोसाईगंज क्षेत्र शिव कुमार दीक्षित आदित्य कैसी के छात्रों के साथ मिलकर रंगबाजी किया करते थे जो क्षेत्र में शब्बीर सदनलाल गोपाल सरीन जय श्री कृष्ण नाम देवी उभरने लगे थे मलिहाबाद वगैरा में सिराज आदि टॉपर थे लेकिन सब का केंद्र बिंदु विश्वविद्यालय था छात्रसंघ पर कब्जा करने की हो रहती थी जिसका लखनऊ विश्वविद्यालय यूनियन केकेसी यूनियन डीएवी यूनियन सिया कॉलेज आदि पर वर्चस्व की लड़ाई होने लगी छिटपुट हिंसक वारदातें भी होती थी लेकिन कंट्रोल रूम लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ ही हुआ करता था या यूं कहें लखनऊ विश्वविद्यालय से ही पूरे लखनऊ और लगभग प्रदेश की बागडोर चलती थी लखनऊ विश्वविद्यालय से कोई भी पंगा नहीं लेता था और ना ही विश्वविद्यालय के भीतर कभी कोई बड़ा कांड हुआ जो भी होता था वह संयुक्त रूप से आंदोलन का रूप होता था और सीधे पुलिस पीएसी से छात्र मोर्चा लेते थे तो वह यह छठ बरतिया मोहल्ले वाले खलीफा उसे कोई बात ही नहीं होती थी सन 70 तक लखनऊ मैं बदमाशी नहीं सिर्फ रंगबाजी होती उसके बाद यहां अपराधिक गतिविधियां शुरू हुई जो गैंग बाजी के रूप में उभरी आपको निरंतर बताता रहूंगा अब सन 70 के बाद की कहानी जारी रहेगी आप हम को पढ़ते रहें और दूसरों को पढ़ाते रहें जो कि मैंने लिखी है एक एक व्यक्ति एक एक रंगबाज की कहानी स्वतंत्र भारत में तो मैं आपको विधि विधान से सारी चीजें बताना चाहता हूं जारी