आज से 35 वर्ष पूर्व इंदिरा गांधी की आज ही के दिन जब हत्या हुई तो कैसे भड़का दंगा लखनऊ में
November 1, 2019 • UPMA SHUKLA

आर डी शुक्ला द्वारा

आज से 35 वर्ष पूर्व जब मेरी उम्र भी 35 वर्ष थी और आज मैं 70 वर्ष का हूं तब मैं 1984 31 अक्टूबर की याद कर रहा हूं जब मैं उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े अखबार द पायनियर और स्वतंत्र भारत का चीफ रिपोर्टर था मुझे याद है कि जिस दिन इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई मैं अपने विधानसभा रोड लखनऊ स्थित कार्यालय करीब 10:00 बजे पहुंचा वहां अजीबोगरीब गहमागहमी थी उस समय तक आकाशवाणी ने इंदिरा जी की हत्या का मामला स्पष्ट नहीं किया था और पूरे शहर में खलबली मची हुई थी सुगबुगाहट मिल चुकी थी लोगों को लेकिन तब तक सच्चाई किसी को नहीं मालूम थी जब मैं प्रेस के अंदर पहुंचा तो पता चला इंदिरा जी की हत्या हो चुकी है और प्रेस में आज विशेष अंक प्रसारित होना है जिसकी तैयारी हमारे संपादक स्वर्गीय वीरेंद्र सिंह जी कर रहे थे हम लोगों को प्रेस की एजेंसियों के द्वारा बहुत कुछ मालूम हो चुका था लेकिन चुकी विशेष सप्लीमेंट बनना था और विशेष अंक बनाने की तैयारी संपादकीय कक्ष के द्वारा की जा रही थी वहीं पर मालूम हुआ हम लोगों को इंदिरा जी की गोली मारकर हत्या कर दी गई है लेकिन पूरे शहर को या यूं कहें पूरे प्रदेश को कुछ भी पक्का नहीं मालूम था क्योंकि आकाशवाणी कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं बता रहा था धीरे-धीरे हमारे प्रेस के सामने विधानसभा रोड पर रॉयल होटल आज का बापू भवन से लेकर हुसैनगंज चौराहे तक जनता की भीड़ लगने लगी सभी उत्सुक थे कि उनको वास्तव में इंद्र जी के साथ क्या हुआ वह स्वतंत्र भारत अखबार से ही पता चल सकता था इसके अलावा राजधानी में कोई ऐसा अखबार या तंत्र नहीं था जिससे जनता को इस हत्याकांड की पूरी खबर मिल सकती हम लोग खासतौर पर मैं संपादक के द्वारा पूरी तरह अलर्ट कर दिया गया क्योंकि मैं उस समय क्राइम रिपोर्टर था बाहर भीड़ बढ़ती जा रही थी और प्रेस के भीतर संपादकीय कक्षाओं का तेजी से सप्लीमेंट का काम चल रहा था यह सब स्वर्गीय संपादक वीरेंद्र सिंह जी कर रहे थे पूरा संपादकीय कक्षाओं की मदद कर रहा था धीरे धीरे विधानसभा रोड जाम होने लगी और भीड़ इतनी बढ़ गई बापू कौन से हुसैन गंज चौराहे तक आदमी आदमी देखने लगा उस समय तक किसी तरह की अराजकता नहीं हो रही थी सब कुछ शांति से हो रहा था ठीक 12:01 के बीच में जब हमारे अखबार का विशेष सप्लीमेंट गेट के बाहर निकला तो अचानक जनमानस में उत्तेजना फैल गई उसका कारण पहले तो सबने सप्लीमेंट के लिए उतावलापन दिखाया हजारों आदमी की भीड़ थी उस समय न मोबाइल का अनल रेडियो पूरी खबर दे रहा था अखबार का सप्लीमेंट उसकी हैडलाइन आज भी मुझे याद है हमारे संपादक स्वर्गीय वीरेंद्र सिंह जी इंदिरा जी को बहुत चाहते थे और उन्होंने जबरदस्त उत्तेजक हेड लाइन लगा दी इंदिरा गांधी को 3 सिखों ने गोलियों से भून डाला इस सप्लीमेंट के निकलते ही प्रेस के सामने उपद्रव शुरू हो गया कुछ सीखो की पगड़िया उछाली आने लगी सामने पिंडी टायर्स एक सरदार जी का शोरूम था वहां पर हमला हो गया देखते ही देखते हजारों हजार सप्लीमेंट अखबार का बाजारों में फैल गया लोगों को वास्तविकता मालूम हुई कि हत्यारे सरदार थे फिर क्या था पूरे शहर में कोहराम मच गया सिखों के ऊपर हमले होने लगे उनकी दुकान घर सब जलाई जाने लगी उनके ऊपर शहर भर में हमले शुरू हो गए मैं क्राइम रिपोर्टर था समय शहर की ओर भागा शहर में चारों ओर से सिर्फ एक ही खबरें आने लगी किस सिखों पर हमले हो रहे हैं उनकी दुकानें चल रही हैं पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है मैं भी इस भागमभाग में अपने खबर के लिए दौड़ने लगा आलमबाग पहुंचा वहां भी जगह-जगह आग लगाई जाने लगी चारबाग में करीब आधा दर्जन सिखों को पीट-पीटकर मार डाला गया सिक्कों को बचाने वाला कोई नहीं मिल रहा था बवाल बढ़ता चला गया लखनऊ पूरा जलने लगा दौड़ते दौड़ते हम लोग थक चुके थे लेकिन लगना रुकने का नाम नहीं ले रहा था पुलिस शांत कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी दमकल विभाग गाड़ियां भेजते भेजते थक गया शाम तक अंत में दमकल ओं का पानी तक खत्म हो गया शहर की हालत को देखकर जो मैंने जाकर संपादक से पूछा किस शहर तो पूरा जल रहा है कहां-कहां से क्या क्या क्या खबर लाऊं उनका कहना था कि आप खबर बटोरने की जरूरत नहीं है मामला पूरे देश में फैल गया लखनऊ के बाद भयंकर दंगे ने कानपुर में लोगों के प्राण लेने शुरू कर दिए उसके बाद जो खबरें आ रही थी वह आप सभी लोग जानते हैं लेकिन वास्तव में पहली वारदात विधानसभा रोड पर ही हुई थी वह भी हमारी प्रेस के सामने अखबार की सप्लीमेंट निकलने के बाद एक सिख की पगड़ी उछाल दी गई थी उसके बाद से मानो 31 अक्टूबर का दिन और उसके बाद 1 नवंबर को भी पूरा शहर जल रहा था हां जब बुरी तरह दंगा फैल चुका तब 24 घंटे बाद कर्फ्यू की घोषणा की गई उस समय शहर पुलिस कप्तान थे बृजलाल उनकी गाड़ी और पुलिस जिस जिस मोहल्ले और क्षेत्र से निकल रही थी वहां पर दंगाई दंगा करते दिख रहे थे आलमबाग का बुरा हाल था शहर की छीछालेदर हो चुकी थी अप पुलिस 24 घंटे बाद मामले को शांत करने के लिए सक्रिय हुई तब तक बहुत विनाश हो चुका था और सबसे बड़ा मामला यह था हमारे अखबार की हेडलाइन 3 सिखों ने इंदिरा गांधी को गोलियों से भून डाला इसका इस कदर असर हुआ कि दंगा लखनऊ में तो पहला ही पूरे देश को उसने अपने आगोश में ले लिया तीसरे दिन जब इंदिरा जी की अंत्येष्टि हो रही थी उस समय लखनऊ में देखने लायक कर्फ्यू लगा था जनता घरों में दुबक चुकी थी जो भी दंगा करने वाले थे घरों में घुसकर टेलीविजन पर इंदिरा जी की अंत्येष्टि देख रहे थे बाजारों सड़कों पर पूरा सन्नाटा था कहीं एक आदमी भी नहीं दिखाई दे रहा था यहां तक कि हमने देखा चारबाग स्टेशन पर ना कोई ट्रेन ना ही कोई कर्मचारी सब सन्नाटा ऐसा माहौल वहां से बंदरों और हमारे अलावा कोई नहीं था उस उस समय लखनऊ की सड़कों पर या तो पुलिस की गाड़ियां थी या हम और पायनियर अखबार की एक महिला संवादाता उसके अलावा एक कोई नहीं था चिड़िया भी नहीं दिख रही थी इतना अजीबोगरीब माहौल हमने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा और माहौल भी बनाने का काम मीडिया ने ही किया जिस तरह की हेडलाइन हमारे अखबार में लगी उसका असर बहुत व्यापक हुआ यही नहीं अगर देखा जाए तो दंगा भड़काने के लिए अखबार का अहम रोल था उस समय ना कोई चैनल चलते थे और  स्वतंत्र भारत और फाइनल अखबार के अलावा प्रदेश में अच्छी पकड़ रखने वाला और कोई माध्यम नहीं था जो कुछ स्वतंत्र भारत ने लिख दिया बस वही सत्य माना जाता था सबसे ज्यादा बिक्री भी उसी की थी मेरा तो मानना है उस समय मीडिया का रूप देखने को मिला था एक सप्लीमेंट गजब का दंगा करवा दिया तब तक हम लोग नहीं जानते थे अखबार का इतना बड़ा असर होता है यू माने तो अखबार की हेडलाइन  दंगा कराने के लिए काफी थी बहुत कुछ जांच पड़ताल हुई सब कुछ हुआ लेकिन नतीजा शून्य था मैं देखने वाला था सबसे पहले हमारे अखबार के दफ्तर के सामने एक सिख पर हमला हुआ वह भी सप्लीमेंट निकलते ही इतनी उत्तेजक हैडलाइन थी हमारे अखबार की और इंदिरा गांधी का अपना एक अलग रोल था इसी कारण पूरा देश दंगे की आग में जल गया हम लोग 2 दिन दौड़ते दौड़ते पागल से हो गए थे अंत में हमको खबर बनाकर देनी पड़ी कि पूरा लखनऊ प्रदेश जल रहा है उसकी विस्तृत रिपोर्ट देने की कोई गुंजाइश नहीं थी इस घटना के बाद और इससे बड़ा क्राइम हम और क्या देख सकते थे चारबाग स्टेशन पर देखा भीड़ ने आधा दर्जन सिक्कों को हम लोगों के सामने पीट पीट कर मार डाला कोई उनको बचाना नहीं आ रहा था आलमबाग में भी कई लोगों की जानें गई फिर पता चला कि पूरे देश में सिखों के ऊपर हमले हो रहे हैं दंगाई खुलकर लूटपाट कर रहे हैं ऐसी हरकत दिल्ली कानपुर सहित पूरे प्रदेश और देश में हो रहे हैं इसमें दंगाइयों ने इतना सामान लूटा इतनी जाने ली कि उसका विवरण हम कितना ही चाहते नहीं दे सकते थे क्योंकि यह हालात इतना अधिक बिगड़ गए थे जिसका पूरा कवरेज सिर्फ यही था देश जल रहा है देश लूट रहा है लोग मारे जा रहे हैं कोई रोकने वाला नहीं था इस दंगे को अखबार अप पुलिस प्रशासन ने 24 घंटे तक किसी तरह दबाने की कोशिश नहीं की और हालत यह थी कि उस समय सरकार भी कांग्रेस की थी दिल्ली भी कांग्रेसका था प्रदेश भी कांग्रेस की थी फिर दंगे को रुकवाने वाला कोई नहीं था आप सोचें हजारों हजार आदमी मर गया शहर के शहर 24 घंटे में सिखों के व्यवसाय को लूट लिया गया और वह बेचारे भारी संख्या में सड़क पर आ गए बाद में ऐसा महसूस हुआ कि यह सब प्रायोजित था अगर शासन प्रशासन ने सरकार ने खासतौर अखबार वालों ने अगर चाहा होता तो यह दंगा उसी दिन रुक जाता हमारी तो आज भी रूह कांप जाती है 31 अक्टूबर 1984 इंदिरा गांधी जी के हत्याकांड के बाद के दंगे को याद करके जो कि मैं स्वयं फील्ड में था और सबसे आगे था सब कुछ सामने देख रहा था जो हुआ ठीक नहीं हुआ इसमें हमारे मीडिया का रोल ठीक नहीं था इतनी उत्तेजक हैडलाइन नहीं लगानी चाहिए थी इसीलिए कहते हैं मीडिया चाहे तो आग लगा दे चाहे तो पानी डाल दे उस समय तो ध्यान नहीं रहा इतना तजुर्बा भी नहीं था कि हमारा अखबार कर क्या रहा है यह गलत है या सही है हां आज जब 35 साल बाद 70 साल की उम्र हो गई और उस हेड लाइन को याद करता हूं तो लगता है कि काफी कुछ गलती तो अखबार की भी थी दंगा भड़काने में हेड लाइन में 3 सिखों का जो जिक्र किया गया वह बहुत गलत था फिर एक बार दंगा जब शुरू हो गया तो उसको भड़काने वाले लोगों ने खूब मजा लिया खूब लूटा मारी हुई लेकिन अफसोस यह होता है की  ऐसा कभी नहीं होना चाहिए था हम तो उस समय एकदम जूनियर थे उम्र भी 35 साल की थी लेकिन हमारे नेता तो बड़े थे हमारे संपादक तो बड़े थे उनको ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए थी जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई करोड़ों अरबों रुपए का सामान लूट लिया गया पता नहीं कितने घर उजड़ गए आज बहुत अफसोस होता है उस तरह की पत्रकारिता और नेतागिरी देखकर जो सत्ता पक्ष ने की उसके बाद वैसा हादसा ना हिंदुस्तान में कभी हुआ है और ना देखने को मिलेगा उस तरह का कर्फ्यू भी किसी को देखने को नहीं मिलेगा